
वैश्विक राजनीति और युद्ध: “प्रभुत्व की जंग में हारती मानवता“
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विनाश की आहट और सच्चाई की तलाश
वैश्विक राजनीति और युद्ध ने हमेशा मानवता पर गहरा प्रभाव डाला है। जब आज दुनिया एक बार फिर किसी बड़े विनाश की आहट को महसूस कर रही है, तो इनके पीछे के उद्देश्य को जानना और उनका विश्लेषण करना महत्वपूर्ण हो जाता है।
एक तरफ कई मोर्चों पर शुरू हो चुके भीषण युद्ध और उनकी विभीषिका झेलते लोग दिखाई दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ इनके कुप्रभावों की चपेट में आती निर्दोष मानवता।
बर्चस्व और पैसों के लिए, आत्मरक्षा के नाम पर जब दुनिया में अशांति फैलाने के सारे संभव प्रयास हो रहे हों, तो सही और गलत के बीच का भेद जानना तथा सच को सामने लाना और भी आवश्यक हो जाता है।
वैश्विक शक्ति संतुलन का बिगड़ना
इस लेख के माध्यम से हम वर्तमान में हो रही वैश्विक घटनाओं का आकलन करेंगे और सच तथा इसके पीछे की सोच को सामने लाने का प्रयास करेंगे।
कहते हैं ना, शांति को बनाए रखने के लिए शक्ति का संतुलन होना जरूरी है।
या यूं कहें कि असीमित शक्ति ही शांति के संतुलन को बिगाड़ देती है—तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वैश्विक महाशक्तियों के दो ध्रुव सामने आए—संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस।
लेकिन समय के साथ डॉलर और नई तकनीक में अमेरिकियों का लगातार बढ़ता दबदबा, और विकासशील देशों (खासकर चीन) की महाशक्ति बनने की होड़ ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया।
हस्तक्षेप की राजनीति और उसके काले अध्याय
लोकतंत्र लाने के छद्म प्रयास हों, या खुद के प्रभाव और फायदे के लिए कभी मुजाहिद बनाए गए लोगों को बाद में आतंकवादी बताकर उनके दमन के नाम पर चलाए गए अभियान—अमेरिका और उसके सहयोगियों ने जो “रायता” पूरी दुनिया में फैलाया, उसके परिणाम आज साफ दिखाई दे रहे हैं।
कहते हैं, सत्य को दबाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।
चाहे अफगान लड़ाकों को सोवियत रूस के खिलाफ खड़ा करना हो,
या पाकिस्तान समर्थित आतंकी गिरोहों को बढ़ावा देना,
या फिर लादेन और उसके नेटवर्क को कभी सह देना, कभी मात देना—
चाहे लीबिया और सीरिया में अपने पसंदीदा सत्ताधीशों को बैठाने की चाह में ISIS जैसे दुर्दांत संगठनों का उभार हो,
या रासायनिक हथियारों के नाम पर इराक में अशांति फैलाना,
या अब परमाणु हथियारों के नाम पर ईरान को दबाने की कोशिश—
ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो अमेरिकी इतिहास के उन काले अध्यायों को सामने लाते हैं, जिन्हें अब दुनिया खुलकर देख रही है।
दुनिया की खामोशी के पीछे की वजह
इन सब के इतर, ध्यान देने वाली बात यह है कि आखिर इन घटनाओं के बाद भी दुनिया मौन क्यों है?
या यूं कहें कि कुछ कर क्यों नहीं पाती?
डॉलर पर व्यापार की निर्भरता, ऊर्जा की जरूरतें, टेक कंपनियों पर एकतरफा नियंत्रण, और किसी भी तरह सत्ता गंवाने का भय—ये कुछ ऐसे कारण हैं जो दुनिया के अधिकांश देशों को खामोश रखते हैं।
नतीजा यह होता है कि प्रभुत्व का दंभ लगातार बढ़ता जाता है।
हाल ही के वेनेजुएला प्रकरण और उस पर दुनिया की चुप्पी ने इस दंभ को और मजबूत किया, जो धीरे-धीरे निरंकुशता की ओर बढ़ता दिखा।
और उसी अतिआत्मविश्वास का परिणाम ईरान का प्रकरण बनकर सामने आया।
ईरान प्रकरण: जब अनुमान गलत पड़ गया
सोच शायद यही रही होगी कि हमलों के बाद सत्ता परिवर्तन हो जाएगा और दुनिया एक बार फिर प्रभुत्व का नजारा देखेगी।
लेकिन कहते हैं ना, कई बार दूसरों को कमजोर समझना ही सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
ईरान दबाव में नहीं आया और अपनी सीमित शक्तियों के साथ सीना तानकर खड़ा हो गया।
अब जब परिणाम सोच के मुताबिक नहीं मिले, तो दुनिया को इस संघर्ष में खींचने की कोशिशें भी दबी जुबान से शुरू होने लगी हैं।
एक और संकट के मुहाने पर दुनिया
और वह दिन भी दूर नहीं दिखता जब अपने हितों को बचाने के नाम पर, खाड़ी देशों को डर दिखाकर हथियार बेचने की लालसा में दुनिया एक और बड़े मानवीय संकट के मुहाने पर खड़ी हो जाए।
मानवता के लिए सीख
लेकिन इन सबके बीच दुनिया को एक सीख भी जरूर मिलती है—
भले ही अकेला चना भाड़ न फोड़ पाए, लेकिन अगर वह पूरी सिद्दत से उछले, तो भड़भूजे की आंख और उसका अहम जरूर फोड़ सकता है।
हो कुछ भी, प्रभुत्व की इस जंग में हार हमेशा मानवता की ही होती है।
और शक्ति के आगे समर्पण सिर्फ खुद को ही नहीं, बल्कि दूसरों के हौसलों को भी तोड़ देता है।
👉 यही आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी सीख है।
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लेखक:- संपादक “निर्भय बोल “